होली को रंगों का त्योहार कहा जाता है। इसको प्रेम और सद्भाव का त्यौहार कहा जाता है। होली का सदियों से भारत के लोगों के दिल और दिमाग में एक विशेष स्थान रहा है। इस त्योहार को वर्षों से भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य के एक आवश्यक हिस्से के रूप में देखा जाता है।
इस लेख में हम इस बात को समझने की कोशिश करेंगे की होली के बारे में रचे गये सामान्य बोध यानि कॉमन सेन्स के परे कितना कुछ है जिसे जाना-समझा जाना चाहिए। किसी भी विषय के बारे में सामान्य बोध, उस विषय से जुड़े अनेक सवालों को सतह पर आने से रोक देता है। क्योंकि लंबे समय तक बने रहने वाले किसी सामान्य बोध को अंतिम सच की तरह समझने की भूल की जाती है। इसलिए यह जरूरी है कि सामान्य बोध पर आलोचनात्मक नजरिए से बात की जाए।
होली के मामले में आलोचनात्मक होने के लिए यह जरूरी है कि इससे जुड़े विमर्श में हाशिये पर धकेल दी गयी आवाजों को शामिल किया जाए। हो सकता है कि हाशिये की आवाजें, मुख्य बना दी गयी आवाजों के बराबर का दम रखती हों। हो सकता है कि वे आवाजें हों तो दमदार, लेकिन हिंसा या वर्चस्व के साधनों का उपयोग कर-करके उनका बेदम कर दिया गया हो I इसलिए हाशिये की आवाजों को सुनना जरुरी है I
होली के त्योहार पर आलोचनात्मक नजरिए से बात करने के लिए कम-से-कम महिलाओं और दलितों की आवाज को विमर्श में शामिल करना अनिवार्य है। क्योंकि होली का त्योहार महिलाओं और दलितों के साथ भिन्न किस्म का रिश्ता रखता है। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो आमतौर पर विधवाओं को होली से दूर रखा जाता है I पुरुषों और सवर्णों के साथ होली का जो संबंध है, वह सम्बन्ध महिलाओं और दलितों के साथ होली के संबंध से काफी अलग किस्म का है।
बचपन और किशोरावस्था में मैं भी होली खेला करता था। वयस्क होने पर होली से मेरा जी उचटने लगा. उस समय जी उचटने के दो कारण थे। एक तो नशा और दूसरा मर्दवाद. एक समय तो ऐसा लगने लगा कि मैं किसके साथ होली मनाऊं? हर पुरुष तो नशे में धुत है। ना होश होता है, ना ही तमीज। और करीब जाकर गले मिलने पर बदबू अलग से सूंघनी पड़ती है। ऐसे में मैं होली से दूर रहने की तरफ बढ़ गया।
होली पर ऐसे एक नहीं, लाखों दृश्य दिख जाएँगे. जिसमें नशेडी महिलाओं पर कूदने के लिए तैयार होकर आते हैं इसलिए कहा जा रहा है कि होली का महिलाओं के साथ वो रिश्ता नहीं है, जो उसका पुरुषों के साथ है। इस त्यौहार में पब्लिक स्पेस में पहले से बनी हुई जेंडर असमानता और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
उस समय मेरा होली न मनाने का निर्णय लेने के पीछे दूसरा कारण होली में मर्दवाद और पितृसत्ता का नग्न प्रदर्शन होना था। मुझे नशा और मर्दवाद, ये दोनों ही बातें नागवार गुजरती थींI
बाद के सालों में होली से दूर रहने के पीछे दो कारण और जुड़ गये। एक तो यह कि प्यार और रंगों का त्योहार कहे जाने के बाबजूद भी यह त्योहार भारत के सवर्णों को भारत के दलितों से प्रेम करना नहीं सिखा सका। आज भी देश के अनेक भागों में दलित और सर्वण एक साथ होली न तो मनाते हैं और न ही मना सकते हैं। जैसे-जैसे होली के साथ जुड़ी इस सच्चाई का पता चलने लगा, वैसे-वैसे समझ में आने लगा कि होली का कुछ के साथ सद्भावना का संबंध है, कुछ के साथ भेदभाव का संबंध है।
होली से दूर रहने का चौथा कारण ज्ञानमीमांसा से संबंधित है। एक त्यौहार जिसमें हिंसा का उत्सव मनाया जाता है। एक औरत को जलाकर अबीर-ओ-गुलाल उड़ाया जाता है। होली की मिथकीय कथा का सांस्कृतिक संदेश यह है कि जो हमारी सत्ता को नहीं मानेगा या मानेगी, वो मारी जाएगी।
हाल के समय में इसमें पांचवां कारण और जुड़ गया।
वह यह कि अब होली को एक सांप्रदायिक ऐजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। होली के मौके पर गाए जाने वाले गीतों में अब सांप्रदायिक नारे भी शामिल किए जा चुके हैं। हो सकता है ऐसा आदिवासी इलाकों और देहातों में न हो रहा हो। लेकिन विश्वविद्यालयों में ऐसा हो रहा है। वहाँ होली के मौके को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के एक अवसर में बदला जा रहा है।
आइए होली के त्यौहार पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करते हैं। सबसे पहले होली पर नारीवादी नजरिये से विचार करते हैं।
नारीवादी नजरिये से देखने पर लगता है कि होली के नाम पर आमतौर पर पुरुषों को महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन करने का लाइसेंस मिल जाता है और कुछ पुरुष होली के नाम पर महिलाओं की आजादी का हनन करने का लाइसेंस खुद को दे देते हैं। कहा जाता है कि “होली है, सब चलता है”. कि “बुरा न मानो होली है”। सवाल यह है कि बुरा क्यों न मानो? अगर बुरा मानने का वाजिब कारण है, तो बुरा माना जा सकता है।
नारीवादी नजरिये से देखने पर यह भी दिखता है कि होली गाते हुए घर-घर या गांव-गांव आमतौर पर कौन घूमते हैं? और नारीवादी नजरिये से यह भी दिखने लगता है कि होली की टोलियों के गुजर जाने के बाद घर की सफाई, कपड़े धोने, दीवारों – खिड़कियों से रंग पोछने का काम किसके जिम्मे आता है?
होली के दिन आमतौर पर बाइक्स पर बिना हेलमेट के रैश ड्राइविंग करते पुरुष दिख जाएँगे। होली के दिन अगर कोई लड़की अपनी कॉलोनी से कुछ ही दूरी पर अपनी सहेली की कॉलोनी तक जाने की सोचे भी तो उसकी आँखों के आगे परेशान करने वाले कई दृश्य धूम जाएँगे।
2023 में होली के दिन लड़कों के द्वारा, एक जापानी लड़की को सेक्सुअली असॉल्ट करने का केस चर्चा में रहा। अनेक चैनलों ने उस वीभत्स घटना को रिपोर्ट किया था। होली के दिन सरेआम एक लड़की को सेक्सुअली असॉल्ट करने के इस वीडियो में बदमाश हैप्पी होली के नारे लगा रहे हैं। किसी को सेक्सुअली असॉल्ट करके आपको हैप्पीनेस मिल रही है। क्या ऐसी मानसिकता का निर्माण होली के त्यौहार की वजह से हुआ है?
अब आते है होली को फेमिनिस्ट नजरिये से समझने के एक और पहलु पर।
याद करके देखिए, होली की तैयारी के लिए गुजिया, नमक पारे, पकोड़े आदि बनाने का काम किसके सर आन पड़ता है। होली तो सबकी है और सबके लिए है तो होली की तैयारी और होली के बाद के काम असमान रूप से क्यों बंटे हुए हैं। अगर होली प्रेम का त्यौहार है तो यह प्रेम घर की महिलाओं को होली से जुड़े काम अकेले करते देखकर क्यों नहीं उमड़ता?
सिलसिला फिल्म में होली के मौके पर एक गीत फिल्माया गया है। उस गीत की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं :
“बेला चमेली का बीड़ा लगाया,
चाबे गोरी का यार
बलम तरसे रंग बरसे”
होली के अवसर के लिए मर्दवादी और सेक्सिस्ट नजरिए से लिखे गये ऐसे गीतों की लिस्ट बहुत लंबी है। ऐसे गीत अक्सर होली के हुड़दंग में बजाए जाते हैं। जानकारों का कहना है कि भोजपुरी समेत अन्य भाषाओँ में भी होली के लिए सेक्सिस्ट गीतों की भरमार हैI
नारीवादी नजरिये से यह सवाल पूछा जाता रहा है कि होली के दिन लड़कियों को छुपने की जरूरत क्यों पड़ती है? वे होली के बहाने बनाए गये वातावरण में अपने लिए किस-किस तरह के खतरे सूंघ लेती हैं? वो कौन लोग होते हैं जो होली के दिन रंगों से सराबोर चेहरा और एक आपराधिक सोच के साथ लड़कियों का शिकार करने निकलते हैं। जिन लोगों के कारण पुलिस को बार-बार एडवाइजरी जारी करनी पड़ती है।
वो कौन लोग हैं जिनके आतंक से निपटने में असमर्थ प्रशासन को, होली के दिन लड़कियों को हॉस्टल में कैद करके रखना पड़ता है। वास्तव में तो आजादी उनकी छीनी जानी चाहिए, जो किसी और की आजादी छीनते हैं। लेकिन होली पर उल्टा दिखाई देता है। आजादी छीनने वाले आजाद घूमते हैं और जिनकी आजादी छीनी जाती है वे कैद में होती हैं।
होली के दिन यह सच सुनहरे रंगों के पीछे भी नहीं छुप पाता कि सार्वजनिक जगहों और महिलाओं के शरीर पर पुरुषों का अधिकार है। होली के दिन ताकतवर से ताकतवर और स्वतंत्र से स्वतंत्र महिला की एजेंसी को छीन कर उसे ऐसी वस्तु में बदल दिया जाता है, जिसे सुरक्षा की जरूरत है। किससे? पड़ोसी से, साथ पढ़ने वालों से, विश्वविद्यालय में पढ़ने वालों से।
आज से 5 साल पहले 2019 में सर्फ एक्सेल ने अपने एक प्रोडक्ट के विज्ञापन का एक वीडियो यूट्यूब पर जारी किया। इस विज्ञापन में होली के दिन एक बच्ची होली खेलना छोड़कर अपने छोटे से दोस्त को अपनी साइकिल पर बिठाकर नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद तक छोड़ती है।
इस विज्ञापन पर अनेक लोगों ने हंगामा खड़ा करने की कोशिश की। इस विज्ञापन में जब लड़की का छोटा सा दोस्त साइकिल से उतर कर सीढ़ियां चढ़ने लगता है और फिर रुक कर लड़की से कहता है कि मैं नमाज पढ़कर आता हूं। जवाब में लड़की उससे कहती है कि नमाज़ के बाद उस पर रंग पड़ेगा। इस पर छोटा सा दोस्त मुस्कुराकर हां में से हिला कर मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ जाता है।
लेकिन हंगामा खड़ा करने वालों को प्रेम का प्रसार पसंद नहीं आता। उन्होंने ऐसे विज्ञापन को भी नफरत उगलने का माध्यम बना दिया। पर शुक्र है कि हजारों लोगों ने उस विज्ञापन को आपसी सद्भाव का संदेश मानकर उसकी सराहना की। ऐसी सराहना मानवीय मूल्यों को मजबूत करने वाली साबित हुई।
अनेक विश्वविद्यालय के बारे में यह पता चला है कि इस साल उनमें होली के दिन होली के बहाने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को मजबूत करने की हरकतें की गईI विश्वविद्यालय में पहले भी होली मनाई जाती रही है। लेकिन जानकारों का कहना है कि विश्वविद्यालय में एक होली के रंग में सांप्रदायिकता का रंग मिलाने का सायास प्रयास नया हैI
होली के त्यौहार को जातिगत भेदभाव के नजरिये से भी समझने की जरुरत है। बार-बार इस बात को दोहराते रहने से कुछ भी नहीं बदला कि होली प्रेम का त्यौहार है। होगा। लेकिन यह प्रेम जाति की सीमाओं के पार नहीं जाता। होली की प्रेम की डोर दलितों और सवर्णों को एक साथ बांधने का काम करती ही नहीं।
अनेक जगहों पर होली के दिन मंदिरों में पूजा होती है लेकिन दलित पूजाओं में भाग नहीं ले सकते। इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण है जो बताते हैं कि होली जातियों के बीच प्रेम बढ़ाने का नहीं बल्कि, जातीय श्रेष्ठता बोध को बनाए रखने का काम करती है। इस विषय पर और अधिक जानने के लिए आप द प्रिन्ट में अमृता चौधरी और उजान घोष का लेख पढ़ सकते हैं। इस लेख का शीर्षक है – Holi harmony is not not for everyone, archives show that how some caste were kept out
इस लेख में ऐसी अनेक घटनाओं का जिक्र है जो बताती है कि एक जाति द्वारा दूसरी जाति के लोगों के साथ होली खेलने की कोशिश ने दंगों का रूप ले लिया था।
जैसे प्यार के मामले में इस बात पर विश्वास ही नहीं किया जा सकता कि: दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजे, आ गया जो, किसी पे प्यार क्या कीजे. क्योंकि, ऐसा बहुत ही कम होता है कि बिना जाति, धर्म, रंग, पैसा, शारीरिक अवस्था देखे बिना प्यार हो जाए। इसी तरह होली सबके साथ नहीं खेली जाती। होली खेलने के मामले में जाति एक फैक्टर है।
1916 की घटना है। एक खीमा नाम का व्यक्ति था। वह लोहार था आर्य समाज ने इसका शुद्धिकरण किया और उसे जनेऊ पहनाया था। लेकिन सवर्णों को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया कि एक दलित जनेऊ पहने। तो होली का दिन था खीमा खतरे से बेखबर होली के जुलूस में शामिल हो गया। उसे लगा कि इसका शुद्धिकरण हो चुका है। अब उसे किसका डर।
लेकिन कुछ सवर्ण यह ठान कर बैठे थे कि वह होली के दिन सबके सामने उसे जनेऊ उनको सौंपने के लिए कहेंगे। उनके बीच कहा सुनी हुई। खीमा पर हमला कर दिया गया और उसके घर में तोड़फोड़ की गई। इस प्रकार सवर्णों ने खीमा को सामाजिक पायदान पर ऊपर चढ़ने की कोशिश करने की सजा होली के दिन दी।
बेहद प्रचलित अर्थों में होली को आज भी सद्भावना और उल्लास का त्योहार माना जाता है। लेकिन होली सभी के लिए हर्षोल्लास का त्यौहार नहीं है।
1990 की बात है। हाथरस जिले के दाताराम नाम के एक दलित व्यक्ति को सवर्णों ने केवल इसलिए जिंदा जला दिया क्योंकि दाताराम ने होली के दिन एक सवर्ण पर रंग लगा दिया था। होली के सद्भाव के त्यौहार के दिन, सवर्णों ने दाता राम को जिंदा जला दिया।
सवर्णों की दलितों को सजा देने की भूख जब इतने से भी नहीं मिटी, तो उन्होंने दलितों के 42 घरों को जलाकर खाक कर दिया। 2017 में उन अपराधियों में से एक कुंवरपाल को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई गई और 13 अन्य अपराधियों को उम्र कैद की सजा मिली।
यह सच है कि ब्राह्मणवादी शक्तियां और व्यक्ति इस तरह की खौफनाक घटनाओं पर हमेशा पर्दा डालने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन दलित स्कॉलर और एक्टिविस्ट लिखते रहते हैं की होली सवर्णों द्वारा दलितों के शरीर और श्रम दोनों का शोषण करने का त्योहार रहा है।
सिद्धि भंडारी ने बर्कले जर्नल आफ सोशियोलॉजी में एक रिसर्च पेपर लिखा। इस पेपर में वे बता रही हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं में होली पर महिलाएं प्रमुखता के साथ घरों से बाहर निकलती हैं। वे बताती हैं कि जहां शहरों में पुलिस को छेड़खानी के खिलाफ एडवाइजरी जारी करनी पड़ती है, वहीं कुमाऊं में महिलाएं होली पर बेधड़क भागीदार होती हैं।
लेकिन सिद्धि भंडारी ने यह नहीं बताया कि कुमाऊं में समूह बनाकर गांव, गांव के मंदिर, पंचायत घरों, में नाच-गाकर होली मनाने वाली महिलाओं में कुमाऊं की दलित महिलाएं शामिल होती हैं या नहीं? और अगर वे होती भी हैं तो क्या वे किसी भी महिला के हाथ में हाथ डालकर उनके साथ नाच सकतीं हैंI यह एक ऐसा सवाल है जिस पर बात करने से हम मुंह छुपाते फिरते हैं I
उत्तराखंड के कवि मोहन मुक्त के काव्य संकलन “हिमालय दलित है” से एक कविता के पाठ के साथ में मैं आज की अपनी बात को खत्म करूँगा। मोहन मुक्त उत्तराखंड के दलित समुदाय से हैं। शानदार कवि हैं। उनकी एक कविता है “होली और माँ”। तो कविता पढ़िए और होली के त्यौहार के बारे में खुले दिल और दिमाग से सोचिए।
होली और माँ….
सफ़ेद साड़ी जिसका किनारा लाल है
जिसमें जगह जगह सुर्ख फूल हैं
रंग के धब्बे हैं
मैं बचपन में ऐसी ही दोपहरों में
होली गाती इन साड़ियों के बीच अपनी माँ को ढूँढा करता था
मैं बच्चा था सचमुच
मुझे पता नहीं था
कि उन औरतों में मेरी माँ हो ही नहीं सकती थी
वहाँ माहौल बुरा नहीं था
गुड़ और सौंफ मुझे भी दिया जाता था
देने वाली कभी झिड़कती नहीं थी
वो मुस्कुराती थी
गुलाल वाले उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देखते ही बनती थी
हालांकि उसके और मेरे हाथों के बीच बना रहे कुछ फ़ासला
वो ख़ास ध्यान रखती थी,
ऊंचाई से देने पर कुछ सौंफ गिर जाती थी नीचे
ऊंचाई से दी गई चीज़ें अक्सर गिर ही जाती हैं
मुस्कराहट और फासला
रंग और बदरंग
गुड़ और सौंफ
ये कॉम्बिनेशन मुझे आज भी समझ नहीं आये
खैर मेरी माँ को वहाँ नहीं मिलना था
वो मुझे वहाँ कभी नहीं मिली
मेरी माँ ही नहीं
वहाँ मुझे मेरी अपनी कोई नहीं मिली
ना चाची ना भाभी ना ताई ना बुआ ना बहनें
मेरी ज़िन्दगी की सब औरतें
उन फाग वाली दोपहरों में भी जंगल से घास और लकड़ियां ढो रही होती थीं
मेरी ज़िन्दगी की औरतों के उत्सव अलग थे
सफ़ेद साड़ी जिसका किनारा लाल है
जिसमें जगह जगह सुर्ख फूल हैं
रंग के धब्बे हैं
मैंने पूरी ज़िन्दगी अपनी माँ को इस साड़ी में नहीं देखा
उसके अपने कारण होंगे
लेकिन मेरी माँ
मेरी एक और माँ को जला देने के उत्सव में
कभी शामिल नहीं हुई…
(बीरेंद्र सिंह रावत का लेख। लेखक शिक्षा शस्त्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।)